बछ बारस-उग्द्वास व्रत

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हिंदू धर्म की मान्यताओं की अनुसार, जन्माष्टमी के चार दिन बाद बछ बारस का पर्व मनाया जाता है। मुख्य रूप से यह व्रत महिलाएं द्वारा किया जाता है, जिसमें वह अपने बच्चों की लंबी आयु के लिए कामना करती हैं। साथ ही इस दिन गौमाता की बछड़े के साथ पूजा करने का विधान है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गौमाता में समस्त तीर्थ और देवी-देवताओं का वास माना गया है। इसलिए गौमाता के निमित्त बछ बारस का व्रत रखना बहुत ही शुभ माना जाता है।

बछ बारस के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। इसके बाद विधि-विधान पूर्वक गौमाता व बछड़े की पूजा करें। इस दिन घर में मिट्टी व गोबर आदि से बनी तलैया (बावड़ी) बनाएं और उसे फूलों आदि से सजाएं। अब इसमें कच्चा दूध और पानी भरकर कुमकुम, मौली, धूप दीप प्रज्वलित कर पूजा करें। इसके बाद बछ बारस व्रत की कथा सुनें। इसी के साथ इस दिन गाय को रोली का टीका लगाकर हरा चारा खिलाएं व परिवार की खुशहाली के लिए कामना भी करें।

बछ बारस व्रत के दिन गेंहू से बने पकवान खाने की मनाही होती है। इस के स्थान पर घरों में बाजरे की रोटी और अंकुरित अनाज की सब्जी बनाई जाती है। यदि अपने यहाँ गौ और बछड़ा न हो तो दुसरे के गाय बछडे की भी पुजा की जा सकती है। यदि वहां भी गौ चछड़ा उपलबध न हो तो मिट्री की गाय व बछड़े का पूजन किथा जाया फिर बछ बारस के चित्र की पूजा भी की जा सकती है।

गाय वछ्डे को रोली का तिलक लगाया जाता है। चावल चढाया जाता है। दही में भीगा बाजरा, आटा, दूध इत्यादि चढ़ाकर वछ वारमयानी वच्छ द्वादशी की कथा सूनी जाय । फिर मोठ, वाजरा और एक रुपया अपनी सास जी को देकर उनके चरण सपर्ष कर उनका आशीष लिया जाय| इस दिन बाजरे की ठंडी रोटी खायी जाय। गो दूग्ध, घी, दही तथा चावल न खाया जाय । पूत्र प्राप्ति के पश्चात् ही इस व्रत को किया जाता है। अपने कुँवारे पूत्र की कमीज या कुर्ते पर स्वास्तिक चिन्ह (सतिया) वनाकर उसे पहनाया जाय । इस व्रत के प्रभाव से पूत्र की रक्षा होती है, उसे दीर्घयु प्राप्त होती है । उसे भूत- प्रेत भय से मुक्ति प्राप्त होती है।

वछवारस या बच्छद्वादशी की कथा

अत्यन्त प्राचीन काल की कथा है कि एक राजा के सात पूत्रतथा एक पौत्र था, राजा सव प्रकार से सुखी तथा धर्मप्रिय था। एकदिन राजा की इच्छा हई कि एद कप (कुओं) खदवाया जाय औरअपने विचार को राजा ने कुओं खुदवा कर पूरा किया, राजा ने वड़ेमनोयोग से एक सून्दर कु आँ खुदवाया, पर संयोगवश क एँ से पानी

ही नहीं निकला, इससे गाजा वडा दुखी तथा उदास हुआ, उसनेज्योतिषियों और पंडितों को बुलाकर इसका कारण पुछा। राजा नेउद्धिग्न होकरे कहा–यह क्या वात है कि मेरे क एँ से पानी ही नहींनिकला ? पंडित कारण पहले ही जान च्के थे, वे कोले-हे राजन् ! यदि आप अपने पौत्र ( नाती, पुत्र का पुत्र ) की वलि दें, तो यह कु अजल से भर जायगा और वर्षा भी होगी ।

लोक कर्याण प्रेमी राजा इतने बड़े त्थाग के लिए त यार हो गयाविधिवत् यज्ञ का आयोजन कर यज्ञ वकिया गया और राजा के पौत्रकी भी बलि दी गथी । परिणाम स्वरूप पंडित की वात सत्य हृुई।क आ जल से भर गथा और ख्व वर्षा भी हुई। राजा को जवजानकारी मिली तो वह जल तथा पूजा सामग्री लेकर कप पूजन केलिये गया । इधर घर में शाक सबजी न होने पर राजा की सेविका(नौकरानी) ने गाय के वछ्ड़े को मारकर उसका मांस पका दिया।

कुप पूजन कर जव राजा रानी लोटे तो देखा कि गाय का वछड़ानहीं है, सेविका से पूछा तो वह बोली-घर में कोई साग न होने केकारण मैंने गाय का वछड़ा ही मार कर पका दिया है। इससे क्रोधितहोकर रांजा वोला-अरे हत्यारी पापिन ! तूने क छ भी विचार नहींकिया और ऐसा पाप कर डाला। पश्चात्ताप करते हुए राजा कहनेलगा-हाय ! जव वन से लौटकर गाय आयगी तो मैं उसे क सेसमझाऊ गा ? शाम को लौट कर जब गाय आई, उसने धरती सु घकर उस जगह को सींग तथा खर से खोदना शुरू कर दिया। जहाँउसके वछ्ड़े का मांस गड़ा था, गाय’ का सींग हाँडी में लगते ही गायने हाँडी को वाहर निकाला , हाँडी के वाहर निकलते ही चमत्कारहुआ-हाँडी से गाय का वछड़ा तथा राजा का पौत्र (नाती) जीवितसक शल निकल आये। इस चमत्कार के कारण यह दिन पर्व बनगया। इसका नाम वखवारस या वच्छद्वादशी पड़ गया तथा इस दिनसे गायों एवं वछ्छड़ों की पूजा की जाने लगी

जिस वर्ष पुत्र का विवाह हो या पुत्र उत्पन्न हो, तभी इस व्रतका उद्यापन किया जाता है। उद्यापन से एक दिन पूर्व सवा सेरवाजरा दान हिया जाता है । वछवारस के दिन एक थाली में १३ मोंठबाजरे की ढेरी बाकर उस पर दो मुट् ठी बाजरे को आटा, घी, ( e )

ीनी मिलाकर रख दिया जाय । इसी में एक तीहृल तथा रुपयारक्खा जाय, इस सामान को अलग-अलग हाथ से स्पर्श कर अपनीसास को दें । देकर सास को चरण स्पर्श करें । इसके पश्चात कँऔर बछड़े की पूजा कर बाह्ाणों को दान दक्षिणा देकर मंगल गानगाये जायें ।